संतान की दीर्घायु का व्रत संकष्टी चतुर्थी

संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए सकट चैथ व्रत का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले इस व्रत को तिलवा चैथ, तिल-कुटा चैथ, माघी चैथ, वक्र-तुण्ड चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत सकट माता, भगवान गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना और व्रत से जुड़ा है। सकट चैथ का पर्व अत्यंत ही पुण्यदायी माना गया है।
महिलाएं बच्चों की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं, तिल-कुटा का भोग लगाती हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर व्रत खोलती हैं। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है और इसे करने से विघ्नहर्ता गणेश सभी बाधाएं हर लेते हैं। व्रती महिलाएं चंद्र दर्शन कर व्रत का पारण करती हैं। सकट चैथ को तिल-कुटा चैथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन तिल का विशेष महत्व होता है। महिलाएं पूजा के दौरान तिल का पहाड़ बनाती हैं, जो जीवन की बाधाओं का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय चांदी के सिक्के से तिल के ढेर को बीच से काटकर संतान के मंगल और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। इस दिन चंद्र देव के दर्शन और पूजन से मानसिक कष्ट दूर होते हैं तथा जीवन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इस बार माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि 6 जनवरी मंगलवार सुबह 8.01 बजे से शुरू होकर 7 जनवरी को सुबह 6.52 बजे तक रहेगी। चूंकि 6 जनवरी को चंद्रोदय चतुर्थी तिथि में हो रहा है और 7 जनवरी को पंचमी तिथि में, इसलिए व्रत 6 जनवरी मंगलवार को ही रखा जाएगा। इसी दिन श्री गणेश जी की पूजा और शाम को चन्द्रोदय के समय तिल, गुड़ आदि का अर्ध्य चन्द्रमा को दिया जाता है। तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूट लिया जाता है। तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं-कहीं तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा तिलकुट बकरे की गर्दन काट देता है। कथा सुनायी जाती है फिर सबको उसका प्रसाद दिया जाता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश अपने भक्तों की बाधाओं को दूर करने और किसी भी संकट को हल करने के लिए जाने जाते हैं। इस त्यौहार का नाम भी सकट चैथ है। कथा के अनुसार एक दिन, माता पार्वती स्नान करने गईं और उन्होंने भगवान गणेश को बाहर पहरा देने और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश दिया। अपनी माता के निर्देश का पालन करते हुए, उन्होंने भगवान शिव को भी अंदर नहीं आने दिया, जिससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश का सिर काट दिया। जब पार्वती ने अपने पुत्र की यह अवस्था देखी, तो वे रोने लगीं और अपने पति से गणेश को पुनर्जीवित करने की विनती की। अनेक प्रयासों के बाद, एक हाथी का सिर काटकर गणेश को दूसरा जीवन दिया गया। उसी दिन, उन्हें किसी भी उत्सव या आरंभ के दौरान सर्वप्रथम पूजा जाने का स्थान प्राप्त हुआ। सकट चैथ पर, उन्हें सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और इसलिए यह दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए शुभ माना जाता है।
सकट चैथ को कई स्थानों पर तिलकुटा चैथ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन तिल का दान अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है, इसलिए सकट चैथ पर तिल और गुड़ का दान अवश्य करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से शनि दोष का प्रभाव कम होता है और जीवन में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं।
माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली सकट चैथ के समय ठंड अपने चरम पर होती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या योग्य ब्राह्मण को कंबल, ऊनी वस्त्र या जूते-चप्पल का दान करने से पितृ दोष शांत होता है। साथ ही संतान से जुड़ी परेशानियों और कष्टों से भी राहत मिलती है।
हिंदू मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाकर अपना जीवन-यापन करता था। मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाने के लिए वह आंवा या फिर कहें भट्ठा लगाता था, लेकिन एक बार उसके आंवा में बहुत कोशिशों के बाद भी उसके बर्तन नहीं पक रहे थे तो वह इसका कारण जानने के लिए एक तांत्रिक के पास गया तो उस तांत्रिक ने उसे इसके पीछे ग्रहों का प्रकोप बताया। इसे दूर करने के लिए उसने कहा कि जब तुम एक बच्चे की बलि दोगे, तभी तुम्हारे बर्तन पकेंगे।
मान्यता है कि उसने अपनी यह व्यथा राजा को बताई तो राजा ने नगर के सभी लोगों को बारी-बारी से अपने बच्चे को बलि के लिए भेजने का आदेश दे दिया. इसके बार जब यह प्रक्रिया बढ़ी तो लोगों की गोद सूनी होने लगीं। एक दिन जब बूढ़ी विधवा मां की बारी आई तो उसने अपने इकलौते बेटे को बलि के लिए जाने से पहले हाथ में एक सुपारी और थोड़ी सी दूर्वा थमा दी और उसे विश्वास दिलाया कि जब तुम आग के आंवे में बैठना अपनी मुट्ठी में इन चीजों को बंद करके गणपति के नाम का सुमिरन करते रहना। तुम्हें कुछ भी नहीं होगा क्योंकि तुम्हारी रक्षा भगवान गणेश और सकट माता करेंगी।
मान्यता है कि जब आंवा में उस बच्चे को बिठाकर आग लगा दी गई तो बूढ़ी मां ने उसके सामने कड़कड़ाती ठंड में बैठकर सकट माता और भगवान गणेश जी से अपने बच्चे की दीर्घायु की प्रार्थना की। मान्यता है कि जिस आंवे को पकाने में कई दिन लगते थे, वह एक ही रात में ठंडा हो गया और बूढ़ी मां का बेटा उसके अंदर सुरक्षित था। खास बात यह भी कि पूर्व में जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित हो गये। मान्यता है कि सकट माता और गणपति के आशीर्वाद से अग्नि भी फूल बन गई तब से लेकर आज तक सकट चैथ के दिन संतान के लिए विशेष रूप से यह व्रत रखा जाता है।(पं. आर.एस. द्विवेदी-हिफी फीचर)



