शिव व शिवा के मिलन की साक्षी है महाशिव रात्रि

भारत में सनातन धर्म में पूजा और उपासना का बड़ा महत्व है। हिन्दू धर्म में पूजा हम विभिन्न अवसरों, आकृतियों और स्थानों पर करते हैं। हम अपने घरों में पूजा करते हैं, मंदिरों में पूजा करते हैं और वार्षिक त्योहारों में पूजा करते हैं। पूजा करने में हम विभिन्न भगवानों और देवी-देवताओं की करते हैं। यह मन को शांत करने का एक सही तरीका है जोकि हमारी बुद्धि को और मन को भटकने नहीं देता और हमें एक जगह शांत करता है। फिर चाहें वो कोई भी देवता हो सबका अलग महत्व है। हम कृष्ण की पूजा करते हैं, विष्णु जी की पूजा कतरे हैं, गणेश जी की पूजा करते हैं, मां सरस्वती को नमन करते हैं। इसी परिपाटी में भगवान शिव हैं जिनकी भक्ति और लीला न्यारी है। भगवान शिवशंकर हिंदू धर्म में प्रमुख देवताओं में से एक हैं जिन्हें त्रिमूर्ति में संहार का देवता माना जाता है। उनको नीलकंठ, महादेव और भोलेनाथ के नाम से भी जाना जाता है। शिव जी की पहचान उनकी माथे पर अर्द्धचन्द्र, गले में सर्प वासुकी जटाओं में गंगा और त्रिशूल, डमरू उनके प्रमुख प्रतीक हैं। उनकी तीसरी आँख ज्ञान का प्रतीक होता है। वैदिक साहित्य में उन्हें रुद्र कहा गया है और तंत्र साधना भी उकनो आती है। शिव अधिकतर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति के रूप में की जाती है। शिवजी को संहार का देवता कहा जाता है। शिव जी सौम्य और रौद्र रूप दोनों के लिये विख्यात हैं रुद्र का अर्थ है स्वउग्र करने वाला अर्थात दुःखों को हरने वाला है।
मान्यता है कि जिस घर में डमरू बजता है उस घर में कल्याण होता है और मंगल होता है। भगवान शिव जी के मस्तक पर अर्द्धचंद्र है। यह अर्द्धचंद्र मन का प्रतीक है चंद्रमा का बढ़ना, घटना आकार उस चक्र का प्रतीक माना जाता है। जिसमें सृष्टि का निर्माण होता है। अर्द्धचन्द्र मन को नियंत्रित करने का संकेत है। शिवजी का त्रिशूल सभी पीड़ाओं का अंत करने वाला होता है। जीवन में सभी कष्टों का अंत त्रिशूल से होता है। त्रिशूल सत्व, धर्म, शांति और प्रतीक्षा का प्रतीक भी माना जाता है। भगवान शिव के नंदी को नैतिकता का संरक्षक माना जाता है। रुद्राक्ष का निर्माण भगवान शिव के आंसुओं से हुआ है। रुद्राक्ष का उपयोग ग्रहों की शांति, आभूषण और आध्यात्मिक लाभों के लिये किया जाता है। इसका प्रयोग पूजा और
ध्यान (मैडिटेंशन) करने के लिये भी किया जाता है।
भगवान शिव के तीसरे नेत्र का मतलब जागरूकता है। शिवजी की तीसरी आंख आध्यात्मिक दुनिया और ज्ञान की शक्ति का प्रतीक भी मानी जाती है। त्रिपुंड का मतलब भगवान शिव के माथे पर तीन सामांतर रेखा से बना तिलक है। शिवजी के इस त्रिपुंड तिलक को सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है यह विनाश, आलस और अशुद्धता का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार भारतीय सभ्यता और संस्कृति में भगवान शिव की व्यापक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। भारतीय अध्यात्म में शिव को सृजन, पालन और संहार की त्रयी का अभिन्न अंग माना जाता है। वह योग और ध्यान के प्रतीक हैं। उनकी तपस्या ध्यान और एकाग्रता को दर्शाती है। उनका तांडव नृत्य सृष्टि की गति और जीवन चक्र का प्रतीक है। उन्हें नृत्य और संगीत का जनक माना जाता है। उनका रूप सादगी का संदेश है। भारतीय लोकजीवन में भी शिव सहज रूप से व्यापक हैं। शिवरात्रि, कांवड़ यात्रा और बारह ज्योर्तिलिंगों की उपासना भारतीय धार्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है।
महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है और यह प्रमुख हिंदू त्योहार है जो भगवान शिव व पार्वती के मिलन का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन शिव जी और पार्वती जी की शादी हुई थी इसलिये यह पर्व उनके विवाह के रूप में मनाया जाता है। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के साथ-साथ और भी देशों में यह पर्व बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन बहुत से भक्त रात भर जागकर शिव जी को याद करते हैं उनका जाप करते हैं। सुबह उठकर स्नान करने के बाद उपवास रखते हैं और शिवजी को जल, शहद, बेलपत्र, धतूरा, दही, भाँग, चंदन चढ़ाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि उनके सभी कार्य पूर्ण हों।
इस वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि 15 फरवरी को मनाई जायेगी यह शाम 05ः4 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी को दोपहर 05ः34 बजे तक रहेगी। महाशिवरात्रि को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिससे इस दिन भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया था। दूसरी कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की थी। यह रात शिव की शक्ति और त्याग का प्रतीक है और यह हमें ध्यान की ओर प्रेरित करता है। इस दिन ध्यान करना विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। हिंदू परम्परा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति रोज ध्यान नहीं करता तो कम से कम इस दिन ध्यान अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह रात ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होती है। ध्यान से हम अपने भीतर की ऊर्जा को शिव तत्व से जोड़ सकते हैं।
महाशिवरात्रि भगवान के गुणों को अपनाकर शांत, आनंदित और विचारशील बनाने के लिये प्रेरित करता है। यह दिन अपने कर्मों पर विचार करने, अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांगने और खुद को एक बेहतर इंसान बनाने की कोशिश करने का समय है। पुराणों के अनुसार, महाशिवरात्रि वह रात है जब भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल का पान किया था। ब्रह्मांड की रक्षा के लिये उन्होंने इस जहर को अपने गले में रोक लिया था जिससे उनका गला (कंठ) नीला हो गया था। इसी कारण उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। महाशिवरात्रि पर लोग खुशी, अच्छी सेहत और जीवन में सफलता के लिये प्रार्थना करते हैं एवं शांति और ज्ञान के लिये प्रार्थना करते हैं। यह दिन सृजन, रक्षा और परिवर्तन में मेल का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि चुनौतियों को पार कर हमें अंदर पूरे संसार में शांति बनाए रखनी चाहिये।
(चक्षु स्वामी-हिफी फीचर)



